श्री राम वंदना स्तुति

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श्री राम वंदना स्तुति, Shri Ram Stuti Lyrics In Hindi, बोल, स्तुति अर्थ सहित, रामचंद्र जी की आरती PDF Free Download

श्री राम वंदना स्तुति PDF Download

श्रीराम के सबसे बड़े भक्त हनुमान जी को ही कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि हनुमान जी का अवतार ही श्री राम की सहायता के लिए हुआ था। इनके पराक्रम की गाथाएं तो अनगिनत हैं। इनके नाम की बात करें तो हनुमान जी की ठुड्डी इन्द्र के वज्र से टूट गई थी।

ऐसे में उनका नाम हनुमान पड़ गया। इसके अलावा ये अनेक नामों से जाने जाते हैं जिनमें बजरंग बली, मारुति, अंजनि सुत, पवनपुत्र, संकटमोचन, केसरीनन्दन, महावीर, कपीश, शंकर सुवन आदि शामिल हैं। इन्हें बजरंगबली के रूप में भी जाना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इनका शरीर एक वज्र की तरह था। इन्हें पवन-पुत्र भी कहा जाता है क्योंकि इन्हें पालने में वायु और पवन दोनों ही बेहद अहम भूमिका थी।

हनुमान जी हमेशा ही श्री राम के नाम का जाप करते थे। मान्यता है कि अगर बजरंगबली के भक्त श्रीराम के नाम का जाप करें तो हनुमान जी प्रसन्न हो जाते हैं। ऐसे में बजरंगबली की पूजा करने से पहले अगर रघुनंदन राम की यह स्तुति की जाए तो व्यक्ति पर हनुमान जी कृपा-दृष्टि बनी रहती है।

Shri Ram Stuti Lyrics In Hindi PDF

दोहा

श्री रामचंद्र कृपालु भजमन, हरण भाव भय दारुणम्।

नवकंज लोचन कंज मुखकर, कंज पद कन्जारुणम्।।

कंदर्प अगणित अमित छवी नव नील नीरज सुन्दरम्।

पट्पीत मानहु तडित रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरम्।।

भजु दीन बंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनम्।

रघुनंद आनंद कंद कौशल चंद दशरथ नन्दनम्।।

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारू अंग विभूषणं।

आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खर-धूषणं।।

इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनम्।

मम ह्रदय कुंज निवास कुरु कामादी खल दल गंजनम्।।

छंद

मनु जाहिं राचेऊ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सावरों।

करुना निधान सुजान सिलू सनेहू जानत रावरो।।

एही भांती गौरी असीस सुनी सिय सहित हिय हरषी अली।

तुलसी भवानी पूजि पूनी पूनी मुदित मन मंदिर चली।।

सोरठा

जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।

मंजुल मंगल मूल वाम अंग फरकन लगे।।

Shri Ram Stuti Lyrics in English

॥ Doha ॥
Shri Ramachandra Kripalu Bhajuman,
Harana Bhavabhaya Daarunam ।
Navakanja Lochana Kanja Mukhakara,
Kanja Pada Kanjaarunam ॥1॥
Shri Ramachandra…

Kandarpa Aganita Amita Chhav Nava,
Neela Neerara Sundaram ।
Patapita Maanahum Tadita Ruchi Shuchi,
Navmi Janaka Sutaavaram ॥2॥
Shri Ramachandra…

Bhaju Deena Bandhu Dinesh Daanav,
Daityavansha Nikandanam ।
Raghunanda Aananda Kanda Kaushala,
Chanda Dasharatha Nandanam ॥3॥
Shri Ramachandra…

Sira Mukuta Kundala Tilaka Chaaru,
Udaaru Anga Vibhooshanam ।
Aajaanu Bhuja Shara Chaapadhara,
Sangraama-jita-khara Dooshanam ॥4॥
Shri Ramachandra…

Iti Vadati Tulsidas Shankar,
Shesha Muni Manaranjanam ।
Mama Hridayakanja Nivaas Kuru,
Kaamaadi Khaladal Ganjanam ॥5॥
Shri Ramachandra…

Manu Jaahin Raacheu Milihi so Baru,
Sahaja Sundara Saanvaro ।
Karuna Nidhaan Sujaan Seelu,
Sanehu Jaanat Raavaro ॥6॥
Shri Ramachandra…

Ehi Bhaanti Gauri Asees Suni Siya,
Sahita Hiyan Harashi Ali ।
Tulsi Bhavaanihi Pooji Puni Puni,
Mudit Man Mandir Chalee ॥7॥
Shri Ramachandra…

॥ Sortha ॥
Jaani Gauri Anukool,
Siya Hiya Harashu Na Jaye Kaheen ।
Manjula Mangala Moola,
Bam Anga Pharkana Lage ।

श्री रामचंद्र जी की आरती

आरती कीजै श्री रघुवर जी की,

सतचित आनंद शिव सुंदर की,

दशरथ तनय कौशल्या नंदन,

सुर, मुनि, रक्षक, दैत्य निकंदन,

अनुगत भक्त-भक्त उर चंदन,

मर्यादा पुरुषोत्तम वर की,

आरती कीजे श्री…….

निर्गुण, सगुण, अनूप रूप निधि,

सकल लोक वन्दित विभिन्न विधि,

हरण शोक भयदायक नवनिधि,

माया रहित दिव्य नर वर की,

आरती कीजै श्री…….

जानकी पति सुर अधिपति जगपति,

अखिल लोक पालक त्रिलोक गति,

विश्व बंध अवंनह अमित गति,

एक मात्र गति सचराचर की,

आरती कीजै श्री………

शरणागति वत्सल व्रतधारी,

भक्त कल्प तरुवर असुरारी,

नाम लेत जग पावन कारी,

वानर सखा दीन दुःख हर की,

आरती कीजै श्री……

श्री रामाष्टक:

हे रामा पुरुषोत्तमा नरहरे नारायणा केशव।

गोविन्दा गरुड़ध्वजा गुणनिधे दामोदरा माधवा।।

हे रामा पुरुषोत्तमा नरहरे नारायणा केशव।

गोविन्दा गरुड़ध्वजा गुणनिधे दामोदरा माधवा।।

हे कृष्ण कमलापते यदुपते सीतापते श्रीपते।

बैकुण्ठाधिपते चराचरपते लक्ष्मीपते पाहिमाम्।।

आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्।

वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव सम्भाषणम्।।

बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्।

पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतदधि रामायणम्।।

श्री राम स्तुति अर्थ सहित

श्री राम चंद्र कृपालु भजमन हरण भाव भय दारुणम्।
नवकंज लोचन कंज मुखकर, कंज पद कन्जारुणम्।।

श्रीराम जो कि सभी पर कृपा व दया करने वाले हैं, मेरा मन उनके भजन करता हैं। श्रीराम हम सभी के मन से इस विश्व के जन्म-मरण रुपी भय को दूर करते हैं। श्रीराम के नेत्र नए खिले हुए कमल पुष्प के समान हैं। उनके हाथ, मुख व चरण भी लाल कमल के समान सुंदर हैं।

कंदर्प अगणित अमित छवी नव नील नीरज सुन्दरम्।
पट्पीत मानहु तडित रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरम्।।

उनका रूप असंख्य कामदेवों से भी सुंदर व मनमोहक हैं। उनके शरीर का रंग नए बने हुए घने नीले बादल के समान हैं। उनका पीताम्बर मेघ रुपी शरीर बिजली के समान चमक रहा हैं। वे जनक पुत्री माता सीता के पति हैं।

भजु दीन बंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनम्।
रघुनंद आनंद कंद कौशल चंद दशरथ नन्दनम्।।

श्रीराम याचकों के मित्र हैं, वे विश्व के लिए प्रकाश हैं, वे राक्षसों का कुल सहित नाश कर देते हैं, वे रघुकुल की संतान हैं, वे आनंद प्रदान करने वाले हैं, वे माँ कौशल्या के पुत्र हैं, वे राजा दशरथ के नंदलाल हैं, मेरा मन उनका ध्यान करता हैं।

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारू अंग विभूषणं।
आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खर-धूषणं।।

उन्होंने मस्तक पर मुकुट धारण किया हुआ हैं, कानों में कुण्डल हैं तो माथे पर तिलक लगाए हुए हैं, उनके पूरे शरीर पर रत्न जड़ित आभूषण हैं। उन्होंने अपनी दोनों विशाल भुजाओं में धनुष-बाण धारण किया हुआ हैं और उन्होंने युद्ध में खर-दूषण पर विजय पा ली हैं।

इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनम्।
मम ह्रदय कुंज निवास कुरु कामादी खल दल गंजनम्।।

तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीराम भगवान शिव, शेषनाग व साधु-मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले हैं। हे श्रीराम! आप मेरे हृदय में कमल के पुष्प की भांति निवास करो और मेरे मन से इच्छा-काम आदि सभी बुराइयों को निकाल दो।

॥ छंद ॥

मनु जाहिं राचेऊ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सावरों।

करुना निधान सुजान सिलू सनेहू जानत रावरो।।

अर्थ – जिसमे तुम्हारा मन आकर्षित हो गया है एवं उसकी छवि तुम्हारे ह्रदय में बैठ गयी है, वही स्वभाव से सहज और सुन्दर सांवले वर तुम्हे प्राप्त होंगे। वह दया के सागर हैं और सूजन है अर्थात सभी को जानने और समझने वाले हैं। वह सभी जगह में निवास करते हैं, तुम्हारे शील और मर्यादा, प्रेम व अनुराग को जानने वाले हैं। 

एही भांती गौरी असीस सुनी सिय सहित हिय हरषी अली।

तुलसी भवानी पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली।।

अर्थ – इस तरह माता गौरी जी का आशीर्वाद सुनकर जानकी जी सहित समस्त सखियाँ ह्रदय से प्रफुल्लित हो गयीं। तुलसीदास जी कहते हैं – सीताजी मन से बहुत खुश होती हैं और माता भवानी को पूजकर के राजमहल की ओर चली जाती हैं। 

।।सोरठा।।

जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।

मंजुल मंगल मूल वाम अंग फरकन लगे।।

अर्थ – गौरी जी के अनुकूल वचनो को सुनकर सीता माता को जो ख़ुशी हुयी वो शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। सुन्दर मंगलों के मूल उनके बाए अंग भी फड़कने लगें जिससे उन्हें आभास हो गया की उनकी ये कामना सिद्ध होने वाली है।