Yog Chikitsa Hindi

Yog Chikitsa Hindi, योग चिकित्सा हिन्दी, पाठ्यक्रम, मूल सिद्धांत, योग चिकित्सा का अर्थ, परिभाषा और सिद्धांत PDF Free Download

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योग एक जीवन पद्धति है, जिसे पतंजलि ने क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया था। इसमें यम, नियम, आसन,प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि आठ अंग है। योग के इन अंगों के अभ्यास से सामाजिक तथा व्यक्तिगत आचरण में सुधार आता है, शरीर में ऑक्सीजन युक्त रक्त के भली-भॉति संचार होने से शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है, इंद्रियां संयमित होती है तथा मन को शांति एवं पवित्रता मिलती है।

योग के अभ्यास से मनोदैहिक विकारों/व्याधियों की रोकथाम, शरीर में प्रतिरोधक शक्ति की बढोतरी तथा तनावपूर्ण परिस्थितियों में सहनशक्ति की क्षमता आती है। ध्यान का, जो आठ अंगो में से एक है, यदि नियमित अभ्यास किया जाए तो शारीरिक अहितकर प्रतिक्रियाओं को घटाने की क्षमता बढती है, जिससे मन को सीधे ही अधिक फलदायक कार्यो में संलग्न किया जा सकता है।

अत्यधिक कार्य, अप्राकृतिक खाद्य पदार्थों का सेवन, पर्यावरणीय प्रदूषण व मानसिक उद्वेग के कारण ही व्याधियाँ त्वरित गति से बढ़ रही हैं। कैंसर, हृदयरोग, एड्स, क्षयरोग, मधुमेह का प्रतिशत हमारे देश सहित सम्पूर्ण विश्व में बढ़ा है। इन रोगों का सम्पूर्ण उपचार बिना जीवन शैली बदलाव के आधुनिक चिकित्सा शास्त्र द्वारा सम्भव नहीं है। यौगिक चिकित्सा आयुर्वेद के अनुसार- ‘या क्रियाव्याधिहरणी सा चिकित्सा निगद्यते’ अर्थात् विभिन्न क्रियायें, संसाधन व उपाय जिनसे रोग का निराकरण होता है उन्हें ‘चिकित्सा’ की संज्ञा दी जाती है।

यौगिक चिकित्सा से तात्पर्य योग विज्ञान अर्थात् यौगिक क्रियाओं द्वारा रोग निवारण करना ही ‘योग चिकित्सा’ कहलाती है। आसन, प्राणायाम आदि समस्त यौगिक प्रक्रियाओं का उपयोग कर विभिन्न रोगों की चिकित्सा करना ही यौगिक चिकित्सा का उद्देश्य है। इन समस्त प्रक्रियाओं का शरीर की सूक्ष्म से स्थूल क्रियाओं पर विशिष्ट प्रभाव पड़ता है। सामान्य शब्दों में कहा जाय तो यौगिक संसाधनों का वह समूह (यम, नियम, षट्कर्म, आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि) जिससे व्याधि की अवस्था से रोगी को स्वस्थ अवस्था में लाने हेतु सतत् प्रयास किया जाता है, वह यौगिक चिकित्सा अर्थात् योग चिकित्सा कहलाती है। प्राचीन ग्रन्थों में रोगोपचार की विभिन्न विधायें वर्णित हैं।

आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक रोगों की चिकित्सा औषध, तंत्र व मंत्र एवं योग के द्वारा करने का निर्देश किया गया है। आज सम्पूर्ण विश्व योग एवं उसके चिकित्सकीय उपयोग के विषय में जानने के इच्छुक हैं। खास करके कोरोना काल आने के पश्चात् आयुर्वेद एवं योग का प्रचार प्रसार सम्पूर्ण विश्व में त्वरित गति से हो रहा है। आयुर्वेद शास्त्र के अनुरुप ही यौगिक चिकित्सा का उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा एवं रोगी व्यक्ति के रोग की निवृत्ति है। योग मुख्यतः एक जीवन पद्धति है, जिसे पतंजलि ने क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया था।

इसमें यम, नियम, आसन,प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि आठ अंग है। योग के इन अंगों के अभ्यास से सामाजिक तथा व्यक्तिगत आचरण में सुधार आता है, शरीर में ऑक्सीजन युक्त रक्त के भली-भॉति संचार होने से शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है, इंद्रियां संयमित होती है तथा मन को शांति एवं पवित्रता मिलती है। योग के अभ्यास से मनोदैहिक विकारों/व्याधियों की रोकथाम, शरीर में प्रतिरोधक शक्ति की बढोतरी तथा तनावपूर्ण परिस्थितियों में सहनशक्ति की क्षमता आती है।

ध्यान का, जो आठ अंगो में से एक है, यदि नियमित अभ्यास किया जाए तो शारीरिक अहितकर प्रतिक्रियाओं को घटाने की क्षमता बढती है, जिससे मन को सीधे ही अधिक फलदायक कार्यो में संलग्न किया जा सकता है। यद्यपि योग मुख्यतः एक जीवन पद्धति है, तथापि, इसके प्रोत्साहक, निवारक और रोगनाशक अन्तःक्षेप प्रभावोत्पादक है। योग के ग्रंथो में स्वास्थ्य के सुधार, रोगों की रोकथाम तथा रोगों के उपचार के लिए कई आसानों का वर्णन किया गया है। शारीरिक आसनों का चुनाव विवेकपूर्ण ढंग से करना चाहिए। रोगों की रोकथाम, स्वास्थ्य की उन्नति तथा चिकित्सा के उद्देश्‍यों की दृष्टि से उनका सही चयन कर सही विधि से अभ्यास करना चाहिए।

अध्ययनों से यह प्रदर्शि‍त होता है कि योगिक अभ्यास से बुद्धि तथा स्मरण शक्ति बढती है तथा इससे थकान एवं तनावो को सहन करने, सहने की शक्ति को बढाने मे तथा एकीकृत मनोदेहिक व्यक्तित्व के विकास में भी मदद मिलती है। ध्यान एक दूसरा व्यायाम है, जो मानसिक संवेगों मे स्थिरता लाता है तथा शरीर के मर्मस्थलों के कार्यो को असामान्य करने से रोकता है । अध्ययन से देखा गया है कि ध्यान न केवल इन्द्रियों को संयमित करता है, बल्कि तंत्रिका तंत्र को भी नियंमित करता है। योग के वास्तविक प्राचीन स्वरूप की उत्पत्ति औपनिषदिक परम्परा का अंग है। तत्व ज्ञान एवं तत्वानुभूति के साधन के रूप में योग का विकास किया गया।